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अंग्रेजों की भारत विजय

अंग्रेजों की भारत विजय


भूमिका

भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से क्रमशः पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, डेनिश व फ्रांसीसी भारत आए। प्रारंभ में यह कंपनियां भारत के राजाओं से किसी विशेष क्षेत्र में एक निश्चित कर अदा करके व्यापार हेतु एकाधिकार प्राप्त करती थी। समय के साथ इन व्यापारिक कंपनियों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ाने लगी। भारतीय राज्यों की आपसी ईर्ष्या एवं धन लोलुपता का लाभ उठाकर यह कंपनियां अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाने लगी। प्रारंभ में इन यूरोपीय कंपनियों के बीच व्यापारिक एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से इनके बीच परस्पर संघर्ष प्रारंभ हुआ।इस संघर्ष में अंग्रेज और फ्रांसीसी को छोड़कर अन्य यूरोपीय कंपनियों ने हथियार डाल दिए। इन दोनों के बीच में संघर्ष में अंग्रेज सफल हुए। इसके बाद अंग्रेजों ने भारतीय राज्यों क्रमशः बंगाल, मैसूर, मराठा एवं सिख राज्यों को जीतना प्रारंभ किया। 1857 तक अपनी रणनीति से संपूर्ण भारत पर अधिकार कर लिया।

यूरोपीय कंपनियों के बीच संघर्ष

आंग्ल-फ्राँसीसी संघर्ष

भारत आने वाली यूरोपीय कंपनियों में पुर्तगाली व डच कंपनियाँ जहाँ व्यापारिक व राजनीतिक प्रतिस्पद्धा में पहले ही परास्त हो गई वहीं डेनिस कंपनी 1745 तक अपनी सारी संपत्ति ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बेचकर भारत से चली गई। अब ब्रिटिश और फ्रेंच कंपनियाँ ही भारत प्रमुख व्यापारिक कंपनियाँ थीं जिनके पास पर्याप्त व्यापारिक एकाधिकार थे। अत: दोनों कंपनियों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक संघर्ष होना स्वाभाविक था। इन प्रतिस्पद्ध्धाओं के चलते दोनों कंपनियों के मध्य तीन युद्ध हुए, जिन्हें 'कर्नाटक युद्ध' के नाम से जाना जाता है। इस आंग्ल-फ्राँसीसी संघर्ष में अंततः अंग्रेज़ों को सफलता प्राप्त हुई।

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-1748)

  • इसे सेंट टोमे का युद्ध भी कहते हैं।
  • इस युद्ध की पृष्ठभूमि ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकारी के युद्ध से ही तैयार हो गई थी। यूरोप में फ्रांस और ब्रिटेन एक दूसरे के विरोधी थे, जिसका प्रभाव भारत में भी पड़ा।
  • प्रथम कर्नाटक युद्ध प्रारंभ होने का तात्कालिक कारण एक अंग्रेज अधिकारी कैप्टन बार्नेट द्वारा कुछ फ्रांसीसी जहाजों पर कब्जा कर लेना था।
  • प्रथम कर्नाटक युद्ध फ्रांसीसी सेना और कर्नाटक के नवाब अनव रूद्दीन के मध्य लड़ा गया। इस युद्ध में फ्रांसीसी विजयी रहे। यह किसी विदेशी सेना की पहली विजय मानी जाती है। इस विजय का मुख्य कारण फ्रांसीसीओं का तोपखाना था।
  • प्रथम कर्नाटक युद्ध का अंत 1748 में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकारी युद्ध की समाप्ति के पश्चात हुई एक्स-ला- शैपेल 1748 से हुआ। इस युद्ध के प्रथम दौर में दोनों दल बराबर रहे।
  • दूसरे शब्दों में कहें तो दोनों ने एक दूसरे के विजित प्रदेशों को लौटा दिया। परंतु इस युद्ध ने भारतीय राजाओं की कमजोरियों को उजागर कर दिया और यह स्पष्ट हो गया कि यूरोपीय प्रणाली से प्रशिक्षित छोटी सेना भी भारतीय राजाओं की बड़ी सेना को भी परास्त कर सकती है।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-1754)

  • इस युद्ध की पृष्ठभूमि भारतीय परिस्थितियों ने तैयार की। हैदराबाद के संस्थापक (एक स्वतंत्र राज्य के रूप में) निजाम-उल-मुल्क की 1748 में मृत्यु के बाद उसके पुत्र नासिर जंग और पौत्र मुज़फ्फरजंग में गद्दी के लिये संघर्ष छिड़ गया।
  • कर्नाटक में भी ऐसी स्थिति तब बन गई जब मराठों ने 7 वर्ष तक कैद में रखने के बाद चंदा साहब को आज़ाद कर दिया। ऐसे में अनवरुद्दीन व चंदा साहब के बीच भी गद्दी के लिये संघर्ष छिड़ गया।
  • फ्राँसीसियों ने चंदा साहब व मुज़फ्फरजंग का समर्थन किया तो अंग्रेज़ों ने अनवरुद्दीन व नासिरजंग का।
  • 1749 में अंबर के युद्ध में अनवरुद्दीन मारा गया तथा उसके बेटे मुहम्मद अली ने त्रिचनापल्ली में शरण ले ली।
  • 1750 में हैदराबाद में नासिरजंग भी मारा गया और मुज़फ्फरजग नवाब बना। उसने प्रसन्न होकर फ्राँसीसी गवनर्नर डूप्ले को मसुलीपट्टनम व पॉण्डिचेरी का क्षेत्र प्रदान कर दिया और साथ ही डूप्ले को कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र का गवर्नर बनाया।
  • इस युद्ध की पृष्ठभूमि भारतीय परिस्थितियों ने तैयार की। हैदराबाद के संस्थापक (एक स्वतंत्र राज्य के रूप में) निजाम-उल-मुल्क की 1748 में मृत्यु के बाद उसके पुत्र नासिर जंग और पौत्र मुज़फ्फरजंग में गद्दी के लिये संघर्ष छिड़ गया।
  • कर्नाटक में भी ऐसी स्थिति तब बन गई जब मराठों ने 7 वर्ष तक कैद में रखने के बाद चंदा साहब को आज़ाद कर दिया। ऐसे में अनवरुद्दीन व चंदा साहब के बीच भी गद्दी के लिये संघर्ष छिड़ गया।
  • फ्राँसीसियों ने चंदा साहब व मुज़फ्फरजंग का समर्थन किया तो अंग्रेज़ों ने अनवरुद्दीन व नासिरजंग का।
  • 1749 में अंबर के युद्ध में अनवरुद्दीन मारा गया तथा उसके बेटे मुहम्मद अली ने त्रिचनापल्ली में शरण ले ली।
  • 1750 में हैदराबाद में नासिरजंग भी मारा गया और मुज़फ्फरजग नवाब बना। उसने प्रसन्न होकर फ्राँसीसी गवनर्नर डूप्ले को मसुलीपट्टनम व पॉण्डिचेरी का क्षेत्र प्रदान कर दिया और साथ ही डूप्ले को कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र का गवर्नर बनाया।
  • मुज़फ्फरजंग की मृत्यु के बाद सलाबतजंग द्वारा फ्राँसीसियों को उत्तरी सरकार का क्षेत्र (मुस्तफा नगर, चिरकाल, राजमुद्री, एल्लोर) प्रदान किया गया। ध्यातव्य है कि इसके पूर्व चंदा साहब ने भी फ्राँसीसियों को पॉण्डिचेरी के कई गाँव प्रदान किये थे।
  • डूप्ले ने हैदराबाद में बुस्सी के नेतृत्व में एक फ्रेंच सैन्य टुकड़ी तैनात की। इस तरह दक्षिणी क्षेत्र में फ्राँसीसियों का नियंत्रण ओर भी प्रभावी हो गया।
  • एक ब्रिटिश क्लर्क के रूप में भारत आए क्लाइव ने कूटनीति का प्रयोग किया और उसने त्रिचनापल्ली पर दबाव कम करने के लिए अर्काट के किले को घेर लिया।
  • इसी समय तंजौर के सेनापति ने धोखे से चंदा साहब की हत्या कर दी और जब त्रिचनापल्ली पर फ्रांसीसियों ने आक्रमण किया वे अंग्रेजों से परास्त हुए। इसी समय फ्रांसीसी सरकार द्वारा डुप्ले को वापस बुला लिया गया और गोडेहियो को पांडिचेरी का अगला गवर्नर बनाकर भारत भेजा।
  • गोडेहियो के प्रयासों से अंग्रेजी कंपनी के साथ 1754 में पांडिचेरी की संधि हुई जिसके तहत दोनों पक्ष युद्ध विराम पर सहमत हुए।
  • इस संधि के परिणाम स्वरुप दोनों कंपनियों को अपने अपने क्षेत्र वापस मिल गए। अंग्रेजों के समर्थक मोहम्मद अली को कर्नाटक का नवाब बनाया गया। इस संधि में दोनों कंपनियों ने भारतीय राजाओं के झगड़ों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया।
  • यह युद्ध 1756 में कर्नाटक तथा इंग्लैंड के बीच प्रशा में शुरू हुए सप्त वर्षीय युद्ध का ही विस्तार था। यूरोप में फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया को तथा इंग्लैंड, प्रशा को समर्थन दे रहे थे, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव भारत में उपस्थित दोनों शक्तियों के संबंधों पर पड़ा।
  • इस युद्ध का तात्कालिक कारण फ्रांस की सरकार द्वारा 'काउंट डी लैली' को भारत के संपूर्ण फ्रांसीसी क्षेत्र के सैनिक एवं असैनिक अधिकारों को प्रदान किया जाना था। 1758 में रैली ने 'फोर्ट सेंट डेविड' पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए बस्सी को हैदराबाद से वापस बुला लिया जो आगे चलकर उसकी एक रणनीतिक भूल साबित हुई।

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1758-1763)

  • दूसरी तरफ अंग्रेज़ी नौसेना ने एडमिरल पोकॉक के नेतृत्व में फ्राँसीसी बेड़े को तीन बार मात दी और इसी समय क्लाइव और वाटसन ने चंद्रनगर को अपने अधिकार में ले लिया।
  • 1760 में अंग्रेज़ी सेनानायक सर आयरकूट के नेतृत्व में 'वांडिवाश का युद्ध' (22 जनवरी, 1760) हुआ, जिसमें फ्राँसीसियों की हार हुई। अंग्रेज़ों ने बुस्सी को कैद कर लिया तथा 1761 में पॉण्डिचेरी पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के बाद माहे एवं जिंजी पर भी उन्होंने कब्ज़ा कर लिया।
  • तृतीय कर्नाटक युद्ध का अंत 1763 में पेरिस की संधि से हुआ इस संधि के शर्तों के अनुसार अंग्रेजों ने फ्रांसीसी क्योंकि भारत में विजिट सारी फैक्ट्रियां लौटा दी पर फ्रांसीसीओं को अपनी फैक्ट्री की किलेबंदी करने की इजाजत नहीं मिली और ना ही वहां सैनिक रख सकते थे अब फैक्ट्रियां केवल व्यापारिक कार्य कर सकती थी।
  • यह युद्ध पूर्णता निर्णायक साबित हुआ अब फ्रांसीसी भारत में एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में समाप्त हो चुके थे।
  • पेरिस संधि के बाद फ्राँसीसियों ने भारत में अपने राज्य विस्तार के विचार को छोड़ दिया और अपना सारा ध्यान व्यापार पर केंद्रित किया।
  • पेरिस की संधि ने भारत में फ्रॉसीसी साम्राज्य की डूप्ले द्वारा रखी मज़बूत नीव को उखाड़ फेंका।
  • लगभग बीस वर्ष की अवधि तक चलने वाले कर्नाटक युद्धों के बाद फ्राँसीसियों की हार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारत के आगामी सर्वेसर्वा अंग्रेज़ ही होंगे।

अंग्रेज़ों की सफलता और फ्राँसीसियों की असफलता का कारण

  • फ्रेंच कंपनी जहाँ राजकीय संरक्षण और शासकीय सहायता पर निर्भर थी, वहीं ब्रिटिश कंपनी एक गैर-सरकारी संस्था थी। वह ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण से मुक्त थी।
  • फ्रेंच कंपनी की आर्थिक स्थिति, ब्रिटिश कंपनी की तुलना में कमज़ोर थी। ब्रिटिश कंपनी के पास व्यापार करने के लिये मध्य भारत, बंगाल, बंबई और मद्रास था, वही फ्रेंच कंपनी केवल दक्षिण भारत के क्षेत्रों तक ही सीमित थी। परिणामतः आर्थिक स्थिति मज़बूत होने के कारण ही अंग्रेज़ अपने युद्धों के भार को उठा सके।
  • अंग्रेज़ों का सैनिक संगठन फ्राँसीसियों की तुलना में श्रेष्ठ था।
  • फ्राँसीसी कंपनी के अधिकारियों में दूरदर्शिता का अभाव रहा, यथा- डूप्ले की वापसी, बूडोने में राजनीतिक दूरदर्शिता का अभाव और लाली की अति आक्रमकता जैसे कारक पतन का कारण बने।
  • बंगाल में चंद्रनगर के फ्राँसीसी अधिकारियों ने नवाब सिराजुद्दौला का साथ नहीं दिया, इससे बंगाल में अग्रेज़ अपना आधिपत्य स्थापित त कर सके।
  • निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आंग्ल-फ्राँसीसी युद्धों में फ्राँसीसी पराजय में आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक सभी पक्षों की भूमिका रही; फ्राँसीसियों की तुलना में अंग्रेजों के ये सभी पक्ष मजबूत साबित हुए। बंगाल का अधिग्रहण

बंगाल का अधिग्रहण

  • अंग्रेज़ों द्वारा बंगाल का अधिग्रहण भारत में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्दध की ऐतिहासिक घटनाओं में एक है। केवल आठ वर्ष के अल्पकाल, अर्थात् 1757 से 1764 के मध्य बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला, मीरज़ाफर तथा मीरकासिम अपनी संप्रभता को कायम रखने में असफल रहे। परिणामस्वरूप, बंगाल में कंपनी की संप्रभुता स्थापित हुई।
  • 1756 ई. में बंगाल नवाब अलीव्दी खाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना।
  • बंगाल के नवाब एवं अंग्रेज के मध्य संघर्ष का प्रमुख कारण 1717 में मुगल बादशाह फर्रूखसियर द्वारा जारी किया गया शाही फरमान था। इस फरमान द्वारा बंगाल में मात्र ₹3000 वार्षिक अदा करने पर कंपनी को उसके समस्त व्यापार में सीमा शुल्क से मुक्ति और कंपनी को इस क्षेत्र में वस्तुओं की आवाजाही पर हस्ताक्षर जारी करने का भी अधिकार दे दिया गया था। कंपनी के अधिकारियों ने उन हस्ताक्षर का दुरुपयोग करना प्रारंभ कर दिया। वे इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत व्यापार पर कर न चुकाने के लिए करने लगे। इससे नवाब को राजस्व घाटा हुआ।
  • बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला और ब्रिटिश कंपनी के बीच बढ़ते तनाव के कारण सिराजुद्दौला ने फोर्ट विलियम (कलकत्ता) पर आक्रमण कर अंग्रेजों को वहां से भागने पर विवश कर दिया। अंग्रेजों ने भागकर फुल्टा दीप पर शरण ली।
  • कलकत्ता के किले पर आक्रमण के समय 'ब्लैक होल' (Black Hole) नामक एक घटना (20 जून, 1756) का उल्लेख मिलता है जिसे 'हॉलवेल' ने प्रस्तुत किया। जिसके अनुसार, नवाब सिराजुद्दौला ने एक छोटी सी काल कोठरी में 146 अंग्रेज़ों को बंद कर दिया जिनमें महज़ 23 ही ज़िंदा बच सके।
  • नवाब सिराजुद्दौला ने मानिक चंद को कलकत्ता का प्रभारी बनाया और इसका नाम बदलकर अलीनगर रख दिया, लेकिन मानिक चंद ने रिश्वत लेकर किला अंग्रेज़ों को सौंप दिया।
  • क्लाइव द्वारा फ्राँसीसी बस्ती चंद्रनगर पर विजय के उपरांत बंगाल में अंग्रेजों की स्थिति और मज़बूत हो गई। अंततः सिराजुद्दौला को अलीनगर की संधि (फरवरी 1757) के लिये विवश होना पड़ा।
  • अलीनगर की संधि के फलस्वरूप अंग्रेज़ों को कलकत्ता की किलेबंदी करने, सिक्के ढालने का अधिकार तथा नवाब द्वारा युद्ध में हुई क्षतिपूर्ति का वचन दिया गया तथा दोनों पक्षों ने भविष्य में शांति बनाए रखने का वादा किया।
  • कालांतर में नवाब सिराजुद्दौला की सत्ता पर कमज़ोर पकड़ एवं दुल-मुल नीति से प्रोत्साहित होकर अंग्रेज़ों ने बंगाल की गद्दी पर एक ऐसे नवाब को बैठाने का निश्चय किया, जिसे आसानी से नियंत्रित कर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये प्रयोग किया जा सके। ध्यातव्य हो, अंग्रेज़ों के इस षड्यंत्र में दरबार के अन्य व्यक्ति भी शामिल थे, यथा-पूर्णिया के नवाब शौकत जंग, सिराजुद्दौला की मौसी घसीटी बेगम, मीर जाफ़र, रायदुर्लभ, जगतसेठ, मानिक चंद, खादिम खान एवं अमीचंद। अंग्रेजों और दरबारियों द्वारा रचे गए इन षड्यंत्रों में कासिम बाज़ार के प्रमुख वॉटसन (watson) की भूमिका अहम थी।

प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757)

  • प्लासी के युद्ध को भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धों में गिना जाता है, क्योंकि इसने आगामी दो सौ वर्षों के लिये भारत की नियति को तय कर दिया था।
  • प्लासी की लड़ाई 23 जन 1757 को बंगाल के नवाब सिराजुदोला की सेना और रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में 'ईस्ट इंडिया कंपनी' की सेना के बीच लड़ी गई।
  • मीर जाफ़र ने सिराजद्दौला को एक कपटपूर्ण परामर्श दिया और नवाब ने युद्ध को एक दिन के लिये स्थगित कर दिया। प्लासी के युद्ध के पूर्व ही नवाब का प्रधान सेनापति मीर जाफ़र तथा दीवान रायदुर्लभ अंग्रेज़ों से मिल चुके थे अत: युद्ध से पूर्व ही यह कह सकते हैं कि प्लासी का युद्ध एक खुला युद्ध नहीं था, वरन् यह एक विश्वासघात था।
  • अगले दिन हुए युद्ध में दोनों विश्वासघातियों की सेनाएँ बिना युद्ध किये वापस लौट गईं। इस युद्ध में नवाब के विश्वसनीय सहयोगी मीर मदान एवं मोहनलाल वीरगति को प्राप्त हुए।
  • युद्ध-पश्चात् नवाब सिराजुद्दौला भागकर मुर्शिदाबाद चला गया, जहाँ मीर जाफ़र के पुत्र मीरन ने मुहम्मद बेग द्वारा उसकी हत्या करवा दी।

प्लासी के युद्ध का परिणाम एवं महत्त्व

  • कंपनी अब एक राजनैतिक शक्ति बनकर उभरी तथा बंगाल के संदर्भ में सर्वोच्च शक्ति बन गई, जिसने वहाँ 'नृप निर्माता' (King Maker) की भूमिका अदा की।
  • प्लासी के युद्ध ने अंग्रेजों की राजनैतिक शक्ति को स्थापित तो किया ही, साथ ही अंग्रेजों की सुगम पहुँच बंगाल के संपन्न खजाने तक भी कर दी। इस आर्थिक सहूलियत से अंग्रेज़ों की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ हुई, जिसने उनकी सैन्य शक्ति को और मज़बूती प्रदान की और अंग्रेज़ इसी खजाने (संसाधनों) के सहारे पूरे भारत पर नियंत्रण करने में सफल रहे।
  • युद्ध-पश्चात् नवाब बने मीर जाफ़र ने कंपनी को 24 परगना की ज़मींदारी प्रदान की। साथ ही, बंगाल, बिहार व उड़ीसा में मुक्त व्यापार की अनुमति प्रदान की।

मीर कासिम का नवाब बनना

  • पलासी के युद्ध के पश्चात अंग्रेजों द्वारा मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया, लेकिन कालांतर में कंपनी की बढ़ती मांग के कारण नवाब की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर हो गई, जिससे उसे कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। मीर जाफर कंपनी की मांगों को पूरा करने में असफल रहा। परिणामतः अंग्रेजों ने उसे नवाब के पद से अपदस्थ कर मीरकासिम को बंगाल का अगला नवाब घोषित किया।
  • मीर कासिम को बंगाल का नवाब बनाए जाने की घटना को गवर्नर वेंसिटार्ट ने क्रांति की संज्ञा दी क्योंकि इस सत्ता परिवर्तन से अंग्रेजों को कई महत्वपूर्ण परिवर्तन लाभ हुए।

मीर कासिम और कंपनी

  • मीर कासिम ने नवाब का पद प्राप्त करने के लिये कार्यकारी गवर्नर हॉलवेल के साथ समझौता किया जिसमें बर्दवान, मिदनापुर एवं चटगाँव की ज़मींदारी कंपनी को सौंपी जानी थी।
  • अंग्रेज़ों के हस्तक्षेप व दरबार के षड्यंत्रों से बचने के लिये मीर कासिम अपनी राजधानी को स्थानांतरित करके मुर्शिदाबाद से मुंगेर ले गया। उसने यूरोपीय मॉडल पर अपनी सेना का सुदृढ़ीकरण किया, तोप तथा बंदूक का कारखाना स्थापित किया व वित्तीय भ्रष्टाचार को समाप्त करने का भी प्रयास किया। मीर कासिम द्वारा नौकरशाही का पुनर्गठन किया गया तथा 'दस्तक' के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास भी किया गया।
  • सैन्य सुधारों और 1763 में नवाब द्वारा आतरिक व्यापार पर लगे सभी करों को समाप्त कर देने से नवाब और कंपनी के संबंधों में तनाव आ गया। करों को समाप्त कर देने से अंग्रेज़ों के विशेषाधिकार समाप्त हो गए। राजस्व वृद्धि हेतु मीर कासिम द्वारा एक अतिरिक्त कर 'खिज़री जमा' लगाया गया, जो सभी के लिये था।
  • परिणामस्वरूप जुलाई 1763 में अंग्रेजों ने मीर कासिम के विरुद्ध औपचारिक युद्ध की घोषणा कर दी तथा मीर जाफ़ंर को पुनः बंगाल का नवाब घोषित कर दिया। इस प्रकार, बक्सर के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
  • बंगाल से निष्कासित होने के बाद मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला से शरण मांगी। स्मरणीय हो अवध में इस समय मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय (अली गौहर) पहले ही शरणार्थी का जीवन व्यतीत कर रहा था। फलतः इन तीनों ने संयुक्त होकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक समझौता किया, जिसके परिणामस्वरूप अक्तूबर 1764 में 'बक्सर का युद्ध' हुआ।

बक्सर का युद्ध (22 अक्तूबर, 1764)

  • बक्सर के युद्ध में अंग्रेज़ों की सेना का सफल नेतृत्व हेक्टर मुनरो और मीर कासिम की सेना का नेतृत्व गुर्गीन खाँ द्वारा किया गया।
  • बक्सर के युद्ध में शुजाउद्दौला, मीर कासिम तथा शाहआलम द्वितीय के नेतृत्व वाली सम्मिलित सेना की पराजय हुई। इस युद्ध के पश्चात् शाहआलम द्वितीय अंग्रेज़ों की शरण में आ गया। दूसरी ओर नवाब शुजाउद्दौला ने कुछ दिन तक विरोध करने के बाद आत्मसमर्पण कर दिया। मीर कासिम दिल्ली की ओर भाग गया, जहाँ 1777 में उसकी मृत्यु हो गई।

बक्सर युद्ध का परिणाम और महत्त्व

  • बक्सर का युद्ध सैन्य दृष्टिकोण से अंग्रेज़ों की बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि प्लासी के युद्ध की विजय सिराजुद्दौला के सेनानायकों के विश्वासघात का परिणाम थी, किंतु बक्सर के युद्ध में अंग्रेज़ बिना किसी छल-कपट के विजयी हुए थे।
  • इस युद्ध में विजय के पश्चात् बंगाल में अंग्रेज़ी सत्ता के प्रभुत्व की स्थापना हुई और कंपनी ने एक अखिल भारतीय शक्ति का रूप धारण कर लिया।

1765 की इलाहाबाद की संधि

इलाहाबाद की संधि हेतु क्लाइव (दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बन कर) को भेजा गया। यह संधि दो चरणों में संपन्न हुई-

इलाहाबाद की प्रथम संधि (12 अगस्त, 1765)

  • यह संधि, मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय तथा अंग्रेज़ गवर्नर क्लाइव के मध्य संपन्न हुई। इस संधि के तहत-
    • कंपनी को मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय से स्थायी रूप से बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। इसके बदले कंपनी ने मुगल सम्राट को 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।
    • कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के ज़िले लेकर मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय को सौंप दिये।

इलाहाबाद की द्वितीय संधि (16 अगस्त, 1765)

  • यह संधि क्लाइव एवं अवध के नवाब शुजाउद्दौला के मध्य संपन्न हुई। इस संधि के तहत-
    • इलाहाबाद और कड़ा को छोड़कर अवध का शेष क्षेत्र नवाब को वापस कर दिया गया।
    • नवाब द्वारा कंपनी को 50 लाख रुपये दिये जाने की बात स्वीकार की गई।
    • कंपनी द्वारा अवध की सुरक्षा हेतु नवाब के खर्च पर एक अंग्रेज़ी सेना अवध में रखी गई।
    • कंपनी को अवध में कर मुक्त व्यापार करने की छूट प्रदान की गई।
    • बनारस और गाज़ीपुर के क्षेत्र में अंग्रेज़ों की संरक्षिता में जागीरदार बलवंत सिंह को अधिकार दिया गया। हालाँकि यह अवध के राजा के अधीन ही माना गया।

बंगाल में द्वैध शासन (1765-1772)

  • 1765 में अपने पिता मीर जाफ़र की मृत्यु के पश्चात् नज्मुद्दौला को कंपनी द्वारा इस शर्त पर नवाब बनने की अनुमति दी गई कि कंपनी निज़ामत के कार्यों की देख-रेख के लिये नायब सूबेदार नियुक्त करेगी। कंपनी ने नायब-दीवान और नायब- निजाम के रूप में मोहम्मद रजा खाँ को नियुक्त किया। परिणामस्वरूप कंपनी का बंगाल की पुलिस और न्यायिक शक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
  • इतिहास में इस व्यवस्था को 'द्वैध शासन' के नाम से जाना जाता है। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रशासन राजस्व वसुली तथा दीवानी न्याय का अधिकार कंपनी के पास था तथा आंतरिक शांति व्यवस्था, फौजदारी न्याय तथा समस्त प्रशासनिक दायित्व नवाब पर छोड़ दिया गया था। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें 'अधिकार' और 'उत्तरदायित्व' दोनों को अलग कर दिया गया था।
  • इलाहाबाद की प्रथम संधि (12 अगस्त, 1765) से कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) मिल गई। कंपनी ने दीवानी कार्य के लिये बंगाल में मोहम्मद रजा खाँ, बिहार में शिताब राय तथा उड़ीसा में रायदुर्लभ की नियुक्ति का। इस तरह बंगाल में नवाब का स्वतंत्र शासन समाप्त हो गया|

प्रभाव

  • प्रारंभ में अल्पकाल के लिये व्यापार में वृद्धि देखी गई किंतु इसके अतिरिक्त यह दौर (1765-1772) बंगाल के लिये अति कठिनाइयों का दौर रहा, जिसने प्रशासनिक व आर्थिक संरचना को ही तोड़कर रख दिया। चूँकि, कंपनी को मुक्त व्यापार का अधिकार प्राप्त था। अतः भारतीय व्यापार का विघटन हुआ।
  • ब्रिटिशों द्वारा अत्यधिक भूमि कर संग्रह के कारण कृषि एवं कृषकों की स्थिति सोचनीय हो गई। इसी बीच 1770 में बंगाल में अकाल पड़ने से जान-माल की बड़े स्तर पर क्षति हुई। उल्लेखनीय है कि इस समय बंगाल का गवर्नर कर्टियस था।
  • इस प्रणाली ने एक भ्रामक प्रशासनिक मशीनरी का निर्माण किया। जिससे अराजकता का माहौल बना परिणामतः इस क्षेत्र में कानून व्यवस्था लगभग ठप्प हो गई।

बंगाल के ब्रिटिश गवर्नर

  • क्लाइव- 1757-1760 व 1765-1767
    • 1765 में बंगाल में बंगाल में द्वैध शासन लागु किया। जो वारेन हेस्टिंगस ने आते ही 1772 में समाप्त किया।
    • बक्सर के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद मुग़ल शासक शाहआलम द्वितीय से 1765 ईo में इलाहबाद की संधि द्वारा बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त की।
    • 1766 में मुंगेर तथा इलाहबाद में श्वेत अधिकारीयों ने श्वेत विद्रोह किया।
    • क्लाइव ने इंग्लैंड में जाकर आत्महत्या कर ली।
  • वेसिटार्ट- 1760-1765
    • बक्सर के युद्ध के समय बंगाल का गवर्नर।
  • वेरेलस्ट - 1767-1769
    • द्वैध शासन बंगाल का गवर्नर था।
  • कर्टियर- 1769-1772
    • इसी के समय 1770 में आधुनिक भारत का प्रथम अकाल पड़ा।

बंगाल के प्रभुत्वसंपन्न शासक के रूप में कंपनी

  • 1772 में जब वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया, तब तक क्लाइव द्वारा बंगाल में स्थापित ह्वैध शासन प्रणाली पूर्णतः विफल हो चुकी थी। अत: हेस्टिंग्स ने ह्वैध शासन समाप्त कर बंगाल पर विजित राज्य के रूप में शासन करना प्रारंभ किया और छद्म मुगल संप्रभुता के नकाब को उतार फेंका।
  • इस प्रकार, कंपनी ने दो दशक से भी कम समय में बंगाल के प्रशासनिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अपना सीधा नियंत्रण स्थापित कर लिया।

मैसूर (प्रारंभिक स्थिति)

  • विजयनगर के पतन के बाद मैसूर वाडयार वंश के शासन में एक स्वतंत्र राज्य के रूप में उभरा।
  • 18वीं शताब्दी में इस राज्य की वास्तविक शक्ति सेनापति देवराज और राजस्व मंत्री नंजराज के हाथों में आ जाती है।
  • हैदर एक सामान्य सिपाही से प्रगति करता हुआ 1755 में डिंडीगुल का फौजदार बन जाता है और वहाँ फ्रांसीसियों की मदद से एक आधुनिक शस्त्रागार की स्थापना करता है।
  • 1761 में हैदर मैसूर का वास्तविक शासक बन जाता है और 1776 में वह स्वयं को राजा घोषित करता है।
  • हैदर ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध नौसेना के महत्त्व की पहचान कर ली थी, जिसे व्यावहारिक रूप देने का कार्य टीपू सूल्तान ने किया। (सीमित रूप से)
नोट: उल्लेखनीय है कि हैदर पेशवा माधव राव से परास्त तो होता है और मराठों को चौथ भी देने को विवश होता है, किंतु माधव राव का मृत्यु के बाद पुनः अपने क्षेत्रों को वापस जीत लेता है। थोड़े ही समय में मैसूर का एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरना पड़ोसी राज्यों को ईर्ष्या का सबब बनता है।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784)

  • एक बार पुनः अंग्रेज़ों और हैदर के बीच संबंध कटु हुए, जब (1770 -71) में मराठों ने उस पर आक्रमण किया था और अंग्रेज़ों ने सहायता नहीं दी। यह 1769 की मद्रास की संधि की शर्तों का उल्लंघन था।
  • 1780 में हैदर अली ने कर्नाटक में अककाट पर आक्रमण कर द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की शुरुआत की। इस युद्ध में निजाम व मराठों ने उसका साथ दिया। उसने अंग्रेज़ कर्नल बेली को बुरी तरह परास्त कर अर्काट पर अधिकार कर लिया।
  • 1780-81 का वर्ष ब्रिटिश साम्राज्य के लिये सर्वाधिक संकट का वर्ष था, क्योंकि जहाँ अमेरिकी उपनिवेश स्वतंत्र हो रहे थे, वहीं फ्राँस, हॉलैंड, स्पेन जैसे देश ब्रिटिशों के विरुद्ध अमेरिकियों का साथ दे रहे थे। भारत में भी मैसूर, निज़ाम एवं मराठा, का त्रिगुट इनके विरुद्ध लड़ रहा था।
  • तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिग्स ने हैदर अली से मुकाबले के लिये आयरकूट को दक्षिण भेजा, जिसने अपनी सफल कूटनीति से महादजी सिंधिया और निजाम को अंग्रेजों विरोधी गुट से अलग करने में सफलता प्राप्त की, लेकिन गुट के बिखर जाने से हैदर अली के उत्साह में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई।
  • 1781 में हैदर अली और अंग्रेजों (अंग्रेज जनरल सर आयरकूट के नेतृत्व में) के बीच 'पोर्टोनोवा का युद्ध' हुआ, जिसमें हैदर अली पराजित हुआ, लेकिन अंग्रेजों को इस सफलता का अधिक लाभ नहीं मिला।
  • अंग्रेज़ों से युद्ध में मिली पराजय से उत्पन्न मानसिक क्षति व घायल होने के कारण 1782 में युद्ध करते हुए हैदर अली की मृत्यु हो गई। हैदर अली की मृत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू सुल्तान मैसूर का अगला शासक बना।
  • हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा। लेकिन इसी समय यूरोप की संधि के कारण फ्राँसीसी युद्ध से अलग हो गए और टीपू ने अंग्रेजों से 'मंगलौर की संधि' (1784) कर ली।

टीपू सुल्तान

  • 1782 में टीपू सुल्तान अपने पिता हैदर अली की मृत्यु के बाद मैसूर का शासक बना। टीपू अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता और शासन-प्रशासन में आधुनिक कारकों को अपनाने के कारण अधिक पहचाना जाता है।
  • टीपू को एक साथ कई भाषाओं, जैसे- अरबी, फारसी, उर्दू एवं कन्नड़ आदि का ज्ञान था। उसने अपने नवीन प्रयोगों के अंतर्गत नई मुद्रा, नई माप-तौल की इकाई और नवीन संवत् (कैलेंडर) का प्रचलन किया।
  • टीपू सुल्तान ने अपने सैन्य संगठन को यूरोपीय पद्धति के अनुरूप संगठित किया तथा अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में पाश्चात्य तत्त्वों को भी अपनाया।
  • 1796 में अंग्रेज़ी नौसेना से मुकाबले के उद्देश्य से टीपू ने एक आधुनिक नौसेना खड़ी करने की कोशिश की। मोलीदाबाद. वाजिदाबाद, मंगलौर आदि में टीपू ने पोत निर्माण घाट (Douk Yard) का निर्माण कराया।
  • टीपू ने अपने पिता हैदर अली के विपरीत (जिसने सार्वजनिक रूप से शाही उपाधि धारण नहीं की) बादशाह की उपाधि धारण की तथा अपने नाम से सिक्के जारी किये।
  • टीपू सुल्तान फ्राँसीसी क्रांति से प्रभावित था। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में 'स्वतंत्रता का वृक्ष' लगवाया तथा 'जैकोबिन क्लब' का सदस्य बन गया तथा अपने को 'नागरिक टीपू' पूकारा।
  • जब 1791 में मराठा घुड़सवारों से श्रृंगेरी के शारदा मंदिर को लूटा तो शृगरी के मुख्य पुरोहित की प्रार्थना पर टीपू ने मंदिर की मरम्मत के लिये तथा शारदा देवी की मूर्ति की स्थापना के लिये धन दिया।
  • टीपू भारत का प्रथम शासक था, जो आर्थिक शक्ति को सैन्य शक्ति की नींव मानता था। टीपू ने यूरोपीयों के समान ही व्यापारिक कंपनी के निर्माण की बात कही और इसी उद्देश्य से उसने आधुनिक उद्योगों की स्थापना को भी प्रोत्साहन दिया। उसने देशीय तथा अंतर्देशीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिये अनेक गुमाश्तों को नियुक्त किया एवं कई उद्योगों को राजकीय सहायता दी।
  • विदेशी व्यापार तथा अपने समकालीन विदेशी राजाओं से मैत्री संबंध बनाए रखने के लिये टीपू ने फ्राँस, तुर्की, ईरान तथा पेगू (बर्मा) में अपने व्यापारिक दूत तथा अरब, कुस्तुन्तुनिया, काबुल और मॉरीशस में अपने दूत मंडल भेजे। उसने बंदरगाह वाले नगरों में व्यापारिक संस्थाएँ स्थापित करके रूस एवं अरब के साथ व्यापार बढ़ाने की कोशिश की।
  • टीपू अपने व्यक्तिगत धर्म के मामले में रूढ़िवादी था, किंतु अन्य धर्मों के प्रति उसने सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया।
  • टीपू ने ज़मींदारी व्यवस्था के स्थान पर रैय्यतवाड़ी व्यवस्था को अपनाया। उसने कर-मुक्त भूमि इनाम पर अधिकार कर पॉलिगरों के पैतृक अधिकार को ज़ब्त कर लिया।
  • टीपू को 'सीधा-सादा दैत्य' (Monster Pure and Simple)' कहा जाता था।
  • टीपू को उसकी वीरता के कारण 'शेर-ए-मैसूर' कहा जाता था। उसका मानना था कि "शेर की तरह एक दिन जीना बेहतर है लेकिन भेड़ की तरह लंबी जिंदगी जीना अच्छा नहीं।"
  • टीपू को यह श्रेय दिया जाता है कि वह प्रथम व्यक्ति था जिसने रॉकेट का युद्ध में प्रयोग किया।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792)

  • टीपू मंगलौर की संधि से संतुष्ट नहीं था। फलस्वरूप उसने कुस्तुन्तुनिया और फ्राँस में अपने दूत भेजकर उनसे भी सहायता प्राप्त करने की कोशिश की।
  • टीपू के समय लड़े गए तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का कारण अग्रेजों ने इसी आधार पर तैयार किया कि टीपू ने फ्राँसीसियों से अंग्रे़ों के विरुद्ध गुप्त समझौता किया था।
  • टीपू ने 1789 में त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया। परिणामतः कॉर्नवालिस ने 1790 में सेना का नेतृत्व करते हुए, वेल्लूर और बंगलौर पर अधिकार कर श्रीरंगपट्टनम पर आक्रमण किया|
  • अंग्रेजों ने पुनः हैदराबाद के निज़ाम और मराठों के सहयोग से श्रीरंगपूट्टनम पर आक्रमण किया।
  • 1792 में तत्कालीन गवर्नर जनरल कॉर्नवालिस ने टीपू के श्रीरंगपट्टनम स्थित किले को घेरकर उसे संधि के लिये मजबूर किया।
  • अंग्रेज़ों और टीपू के बीच मार्च 1792 में श्रीरंगपट्टनम की संधि संपन्न हुई। संधि की शर्तों के अनुसार टीपू को अपने राज्य का आधा हिस्सा अंग्रेज़ों तथा उनके सहयोगियों को देना था। साथ ही, युद्ध के हर्जाने के रूप में तीन करोड़ रुपये भी अंग्रेज़ों को देने थे।हर्ज़ाना न देने तक अंग्रेज़ों ने टीपू के दो पुत्रों को बंधक बनाकर रखा।
  • इस संधि के अंतर्गत अंग्रेज़ों को बारामहल, डिंडीगुल तथा मालाबार मिला। मराठों को तुंगभद्रा नदी के उत्तर का भाग और निजाम को पेन्नार तथा कृष्णा नदी के बीच का भाग मिला।
  • इसी संदर्भ में कॉर्नवालिस ने कहा था कि "हमने अपने मित्रों को शक्तिशाली बनाए बिना अपने शत्रु को पंग कर दिया है।"

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)

  • एक बार पुनः अधिकार क्षेत्र और अंग्रेज़ों की बढ़ती राजनीतिक लालसा के कारण टीपू और अंग्रेज़ों के बीच युद्ध (चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध) लड़ा गया।
  • इस युद्ध के समय टीपू ने अंग्रेजों से मुकाबले हेतु अंतर्राष्ट्रीय सहयोग लेने कि लिये कई प्रयास किये। उसने इसी संबंध में नेपोलियन से भी पत्र व्यवहार किया।
  • 4 मई, 1799 को टीपू अंग्रेजों की संयुक्त सेना से बहादुरी के साथ लड़त हुए युद्ध में मारा गया। अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्रनम पर अधिकार कर लिया।
  • अंग्रेजों ने मैसूर पर नियंत्रण स्थापित करके पुराने वाड्यार वंश के अल्पायु शासक कृष्णराज द्वितीय को सत्ता सौंपकर उससे सहायक संधि कर ली।
  • एक बार पुनः अधिकार क्षेत्र और अंग्रेज़ों की बढ़ती राजनीतिक लालसा के कारण टीपू और अंग्रेज़ों के बीच युद्ध (चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध) लड़ा गया।
  • इस युद्ध के समय टीपू ने अंग्रेजों से मुकाबले हेतु अंतर्राष्ट्रीय सहयोग लेने कि लिये कई प्रयास किये। उसने इसी संबंध में नेपोलियन से भी पत्र व्यवहार किया।
  • 4 मई, 1799 को टीपू अंग्रेजों की संयुक्त सेना से बहादुरी के साथ लड़त हुए युद्ध में मारा गया। अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्रनम पर अधिकार कर लिया।
  • अंग्रेजों ने मैसूर पर नियंत्रण स्थापित करके पुराने वाड्यार वंश के अल्पायु शासक कृष्णराज द्वितीय को सत्ता सौंपकर उससे सहायक संधि कर ली।

आंग्ल-मराठा संघर्ष

  • 18वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध (लगभग 5 वर्षों) में अंग्रेज़ों और मराठों के बीच राजनीतिक सर्वोच्चता के लिये तीन बार मुठभेड़ (युद्ध) हुई, जिसमें अंग्रेज़ अंतिम रूप से विजयी हुए।
  • पानीपत के तृतीय युद्ध में पराजय के बाद माधव राव (1761-1772) ने मराठों की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः बहाल करने का प्रयास किया। 1772 में माधव राव की मृत्यु के उपरांत उसका छोटा भाई नारायणराव पेशवा बना। 1773 में उसके चाचा रघुनाथराव ने उसकी हत्या करवा दी। नारायणराव के पुत्र माधव नारायणराव को जब पेशवा घोषित किया तब रघुनाथ राव (राघोवा) ने पेशवा बनने की चाहत में अंग्रेज़ों से मदद मांगी और उनसे 'सूरत की संधि' (1775) की। यहीं से आंग्ल-मराठा युद्ध की नींव पड़ी।
  • सूरत की संधि (1775) के तहत पेशवा पद के बदले नज़राना तथा सालसेट, बसीन व थाणे का क्षेत्र अंग्रेजों को देना निश्चित हुआ और सूरत एवं भड़ौच का राजस्व भी अंग्रेज़ों को दिया जाना तय हुआ। इसके बदले अंग्रेज़ राघोवा को पेशवा बनाने पर सहमत हो गए। सूरत की संधि बंबई की अंग्रेज़ी सरकार एवं रघुनाथ राव के बीच हुई थी, जिसका कलकत्ता अंग्रेज़ी सरकार ने विरोध किया।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782)

  • सूरत की संधि के तहत कर्नल कीटिंग के नेतृत्व में जब एक अंग्रेज़ सेना सूरत पहुँची तो मराठों ने इसका विरोध किया। परिणामस्वरूप 18 मई, 1775 को 'आरस के मैदान' में अंग्रेज़ों और मराठा सेनाओं के बीच युद्ध हुआ, जिसमें मराठों की पराजय हुई। हालाँकि पूना में मराठों का अधिकार बना रहा। युद्ध पश्चात् पुरंदर की संधि हुई।
  • पुरंदर की संधि (1776) के तहत यह निश्चित किया गया कि कंपनी राघोवा का समर्थन नहीं करेंगी किंतु सालसेट व थाणे पर अंग्रेज़ों का प्रभुत्व बना रहेगा। पुरंदर की संधि कलकत्ता की अंग्रेज़ी सरकार और पूना दरबार के बीच हुई थी।
  • बंबई की अंग्रेज़ी सरकार ने पुरंदर संधि का विरोध किया। परिणामतः बबई सरकार ने पुन: युद्ध छेड़ दिया। 1779 में पश्चिमी घाट में स्थित तालगाँव की लडाई में अंग्रेज़ों को पराजय झेलनी पड़ी। फलस्वरूप बंबई सरकार को पूना दरबार से बड़गाँव की अपमानजनक संधि करनी पड़ी।
  • बड़गाँव की संधि (1779) के तहत 1773 के बाद बंबई सरकार द्वारा विजित सारे मराठा क्षेत्र वापस करने पड़े। वारेन हेस्टिग्स के लिये यह काफी अपमानजनक संधि थी। फलतः उसने इसे मानने से इनकार कर दिया। कालांतर में अंग्रेज़ सरकार और पूना दरबार के बीच सालबाई की संधि हुई।
  • सालबाई की संधि (1782) महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से संपन्न हुई। सालसेट व एलफेंटा अंग्रेज़ों के पास रहने दिया गया और कंपनी ने पेशवा को पेंशन देना स्वीकार कर लिया। इसी समय से फडनवीस, (इसे 'मराठों का मैकियावेली' कहा जाता था) एवं महादजी सिंधिया के मध्य प्रभावशीलता का द्वंद्व आरंभ हो गया|
  • 1800 में फडनवीस की मृत्यु के बाद बाजीराव द्वितीय ( 1795-1818) एक स्वेच्छाचारी शासक बन गया। इसने सिंधिया व होल्कर को परस्पर लड़वाकर अपनी सर्वोच्चता बनाये रखने की सोची। उधर सिंधिया व होल्कर भी इसी प्रयास में थे कि पेशवा उनके प्रभाव में आ जाएँ।
  • इस संदर्भ में पेशवा ने 1801 में जसवंत राव होल्कर के भाई की हत्या कर दी तो होल्कर ने पेशवा तथा सिंधिया की सम्मिलित सेना को 'हदपसर' नामक स्थान पर पराजित किया, तत्पश्चात् पेशवा ने भाग कर बसीन में शरण ली। जहाँ उसने अंग्रेज़ों से बसीन की संधि की।
  • बसीन की संधि (1802) के तहत पेशवा ने अपनी स्वायत्तता अंग्रेज़ों को सौंप दी। इस संधि के तहत-
    • पेशवा ने पूना में अंग्रेज़ी सेना को रखना स्वीकार किया।
    • गुजरात तथा तुंगभद्रा नदी के दोआब क्षेत्र अंग्रेज़ों को सौंप दिये, मराठों के विदेशी संबंध अंग्रेज़ों के अधीन हो गए।
    • पेशवा ने सूरत नगर कंपनी को सौंप दिया।

यह संधि द्वितीय-आंग्ल मराठा युद्ध का कारण बनी क्योंकि इस संधि के प्रावधान मराठा सरदारों को अपमानजनक लगे।

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805)

  • बसीन की संधि को कालांतर में मराठों द्वारा चुनौती दी गई। दौलतराव सिंधिया और रघुजी भोंसले द्वितीय ने अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया।
  • अंग्रेज़ों ने ऑर्थर वेलेजली के नेतृत्व में दक्कन में तथा जनरल लेक के नेतृत्व में उत्तर भारत में मराठों के विरुद्ध सफल अभियान किए। 23 सितंबर, 1803 को आर्थैर वेलेजली ने सिंधिया और भोंसले की संयुक्त सेनाओं को पराजित किया। उत्तर भारत में जनरल लेक ने दिल्ली और आगरा पर कब्ज़ा कर लिया। इस प्रकार कुछ महीनों में ही अंग्रेज़ों ने उत्तर एवं दक्षिण भारत में मराठों के कई क्षेत्रों को जीता। परिणामतः भोंसले और सिंधिया को विवश होकर अंग्रेज़ों से दो संधियाँ (देवगाँव की संधि एवं सुर्जी-अर्जनगाँव की संधि 1803) करनी पड़ीं। बाद में होल्करों ने भी राजपुर घाट (1805) की संधि की।

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (I816-1819)

  • आंग्ल-मराठा टकराव का तृतीय एवं अंतिम चरण लॉर्ड हेसि्टिग्स के आने पर आरंभ हुआ।
  • तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का एक बड़ा कारण तात्कालिक गवर्नर जनरल लॉर्ड हेरस्टिंग्स की दमनात्मक नीतियाँ भी थीं हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के विरुद्ध अपने अभियान की शुरूआत की, जिससे मराठों के प्रभुत्व को चुनौती मिली।पिंडारियों के विरुद्ध अपने अभियान की शुरूआत की, जिससे मराठों के प्रभुत्व को चुनौती मिली।
  • पिंडारियों के विरुद्ध हेस्टिग्स की प्रत्यक्ष कार्रवाई से तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध शुरू हो गया।
  • मराठों ने पूना के अंग्रेज़ रेजिडेंट व अन्य कैम्पों पर हमले किए। इस युद्ध में अंतत: पेशवा अंग्रेजों से पराजित हुआ और आत्मसमर्पण कर दिया। परिणामतः दोनों के बीच पूना की संधि हुई।

पिंडारी (Pindari)

पिंडारी मराठा सेना में अवैतनिक सैनिकों के रूप में अपनी सेवा देते थे। ये लूटमार करने वाले दलों के रूप में होते थे। इनकी नियुक्ति बाजीराव प्रथम के समय शुरू हुई थी। ये मराठों की ओर से युद्ध में भाग लेते थे, जिसके बदले उन्हें लूट से प्राप्त रकम का एक निश्चित हिस्सा दिया जाता था।

पूना की संधि और पेशवा का अंत

  • तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों द्वारा पेशवा के साथ एक संधि की गई, जिसके अनुसार पेशवा का समस्त राज्य बंबई प्रेसिडेंसी के अंग्रेज़ी राज्य में मिला लिया गया। पेशवा के अतिरिक्त सिंधिया, भोंसले आदि ने भी संधियों के माध्यम से अंग्रेज़ी संरक्षण स्वीकार कर लिया।
  • संधि के बाद पेशवा का पद 1818 में समाप्त कर दिया गया और बाजीराव द्वितीय को कंपनी का पेंशनर बनाकर बिठूर (कानपूर, उत्तर प्रदेश) भेज दिया गया। पेशवा के सहायक त्रियंबकराव को आजीवन कारावास देकर बनारस के पास चुनार के दुर्ग में केद कर दिया गया। नाममात्र के छोटे से राज्य सतारा में छत्रपति शिवाजी के वंशज को राजा बनाया गया। इस प्रकार हेस्टिंग्स ने पेशवा का अंत कर दिया।

आंग्ल-सिख संघर्ष

  • 1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। तत्पश्चात् अगले 10 वर्षों में ही उसका राज्य समाप्त हो गया| सिख क्षेत्रों पर अधिकार को लेकर अंग्रेज़ों और सिखों के बीच जो युद्ध हुए उन्हें 'आंग्ल-सिख युद्ध' के नाम से जाना जाता है।
नोट: पंजाब के संदर्भ में ऑसबर्न का कहना था कि रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद हमें पंजाब का विलय कर लेना चाहिये। जब हम बड़े-बड़े ऊँट को निगल चुके हैं तो इस मच्छर की बात ही क्या?

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-1846)

  • प्रथम आंग्ल-सिख संघर्ष के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिग तथा अंग्रेज़ी सेना का प्रमुख सर ह्यूगफ था। अंग्रेजी सेना ने सितंबर 1845 में 'मुदकी', दिसंबर 1845 में फिरोज़शाह, जनवरी 1846 बद्दोवाल और आलीवाल की लड़ाइयाँ लड़ीं, परंतु सबराओं की लड़ाई (फरवरी 1846) निर्णायक सिद्ध हुई।
  • इस युद्ध के पश्चात् मार्च 1846 में अंग्रेज़ों एवं सिखों के बीच लाहौर की संधि' संपन्न हुई। इस संधि के अनुसार, सिखों ने सतलज नदी से दक्षिण की तरफ के सारे क्षेत्र अंग्रेज़ों को सौंप दिये।
  • इस संधि के बदले में अंग्रेज़ों ने दिलीप सिंह को महाराजा तथा लाल सिंह को वज़ीर के रूप में स्वीकार कर लिया।
  • लाहौर के क्षेत्रफल को कम करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ों ने कश्मीर क्षेत्र को राजा गुलाब सिंह को बेच दिया, जिस कारण सिखों ने लाल सिंह के नेतृत्व में पुनः विद्रोह कर दिया।
  • आगे चलकर दिसंबर, 1846 में भैरोवाल की संधि संपन्न हुई. जिसके अनुसार राजा दलीप सिंह के वयस्क होने तक ब्रिटिश सेना को लाहौर में तैनात कर दिया गया सिख सरदारों की एक परिषद् अंग्रेज़ रेजिडेंट की अध्यक्षता में शासन के कार्य हेतु नियुक्त की गई तथा राज्य के किसी भी हिस्से में ब्रिटिश सेना की तैनाती सुनिश्चित कर दी गई।

रणजीत सिंह (1780-1839)

  • रणजीत सिंह का जन्म 1780 में सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महासिंह के यहाँ हुआ था।
  • महासिंह की मृत्यु के बाद 1792 में रणजीत सिंह 12 वर्ष की आयु में सुकरचकिया मिसल के प्रमुख बने ।
  • 1799 में रणजीत सिंह ने लाहौर पर कब्ज़ा किया और 1802 (कुछ स्रोतों में 1805) में भंगी मिसल से अमृतसर छीन लिया।
  • रणजीत सिंह ने कुछ ही वर्षों में मुल्तान, कश्मीर और पेशावर पर अधिकार कर लिया।
  • महाराजा रणजीत सिंह ने 'लाहौर' को अपनी राजधानी बनाया।
  • रणजीत सिंह ने अपनी सेना का गठन यूरोपीय ढंग से किया, जिसमें घुड़सवार के प्रशिक्षण के लिये फ्राँसीसी सेनापति आलार्ड तथा पैदल सेना के लिये इटली के सेनापति बंतूरा और तोपखाने के प्रशिक्षण के लिये फ्राँसीसी जनरल कोर्ट एवं अमेरिकी कर्नल गार्डनर को नियुक्त किया। रणजीत सिंह के सैन्य संगठन को 'भारतीय पृष्ठभूमि में ब्रिटिश-फ्राँसीसी सैन्य व्यवस्था' कहा जाता था।
  • कहा जाता है कि रणजीत सिंह की फौज एशिया की दूसरी सबसे अच्छी फौज थी। पहला स्थान अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज का था।
  • रणजीत सिंह ने 1809 में राज्य की सुरक्षा की दूष्टि से चाल्ल्स मेटकॉफ से 'अमृतसर की संधि' की।
  • अपने भाई द्वारा अपदस्थ अब्दाली के पौत्र 'शाहशुजा' की सहायता के कारण महाराजा रणजीत सिंह को वह प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा प्राप्त हुआ, जिसे नादिरशाह लाल किले से लूटकर ले गया था।
  • फ्राँसीसी यात्री विक्टर ज़ाकमाँ ने रणजीत सिंह की तुलना 'नेपोलियन' से की थी।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848-1849)

  • मुल्तान के गवर्नर मूलराज को अपदस्थ करने के कारण सिखों ने विद्रोह किया जिसका लाभ उठाकर डलहौजी ने युद्ध की घोषणा कर दी।
  • रामनगर का युद्ध ( नवंबर 1848), चिलियाँवाला का युद्ध (जनवरी 1849) द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध से संबंधित है।
  • लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में चाल्ल्स नेपियर के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना ने फरवरी 1849 में गुजरात के युद्ध में अंतिम रूप से सिख सेना को परास्त किया।
  • गुजरात युद्ध जीतने के पश्चात् लॉर्ड डलहौजी ने मार्च 1849 में पंजाब को अंग्रेज़ी राज्य के अंतर्गत विलय कर लिया। महाराजा दलीप सिंह को अंग्रेजों ने लगभग 5 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन पर शिक्षा के लिये इंग्लैंड भेज दिया। दलीप सिंह से कोहिनूर हीरा लेकर ब्रिटिश राजमुकुट में लगा दिया गया।

अन्य युद्ध तथा संधियाँ

आंग्ल-नेपाल युद्ध

  • लॉर्ड हेस्टंग्स ने सर्वप्रथम नेपाल राज्य के निवासी गोरखाओं से युद्ध किया। सीमावर्ती क्षेत्र होने के नाते इस प्रदेश का सामरिक महत्त्व अत्यधिक था।
  • 1816 में गोरखाओं से बातचीत के माध्यम से 'सुगौली की संधि" हुई। जिसके तहत-
    • अंग्रेज़ों को गढ़वाल व कुमाऊँ के किले तथा तराई का अधिकांश भाग प्राप्त हुआ।
    • नेपाल ने सिक्किम राज्य से अपने समस्त अधिकार वापस ले लिये।
    • नेपाल की राजधानी काठमांडू में अंग्रेज़ रेजिडेंट तैनात की गई।

आंग्ल-बर्मा युद्ध

  • पूर्वी सीमावर्ती क्षेत्र बर्मा को तीन युद्ध व संधियों के पश्चात् ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
    • लॉर्ड एमहस्स्ट ने मणिपुर व आसाम में उनके प्रवेश को लेकर युद्ध (1824) किया। अंतत: 1826 में 'यान्दबू की संधि' की गई।
    • 1852 में डलहौजी ने इमारती लकड़ियों व बर्मा के जंगलों पर आधिपत्य की इच्छा से युद्ध किया और लोअर बर्मा (पेगू) के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
    • 1885 में डफरिन के समय में आंग्ल-बर्मा का तीसरा युद्ध लड़ा गया, तत्पश्चात् बर्मा का भारत में विलय कर लिया गया।

आंग्ल-अफगान युद्ध

  • 1839-42 में गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड के समय में पहला युद्ध लड़ा गया।
  • शाहशुजा को दोस्त मुहम्मद की जगह वहाँ का शासक बनाने के लिये त्रिपक्षीय संधि में रणजीत सिंह भी शामिल हुए। जॉन कीन के नेतृत्व में बोलन दरे से अंग्रेज़ी सेना भेजी गई और काबुल पर अधिकार प्राप्त कर लिया गया। 1840 में दोस्त मुहम्मद के आत्मसमर्पण पर शाहशुजा को शासक घोषित कर दिया गया।
  • 1842-1878 अफगानिस्तान के प्रति अहस्तक्षेप की नीति को अपनाया गया। 1878-80 में लिटन ने अग्रगामी नीति को अपनाते हुए दूसरा आंग्ल-अफगान युद्ध छेड़ दिया। कुछ विजयों के उपरांत वहाँ ब्रिटिश रेजिडेंटों की नियुक्ति की गई, किंतु अनियंत्रित स्थिति को देखते हुए बाद में अफगानिस्तान को 'बफर स्टेट' के रूप में स्वीकारा गया।

सिंध अभियान (1843)

  • एलनबरो के शासनकाल में 1843 में सिंध का अंग्रेज़ी राज्य में विलय किया गया|

 

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